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Ajit Pawar Aircraft Incident: हाईकोर्ट निगरानी में CBI जांच की मांग तेज

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Ajit Pawar Aircraft Incident | Mumbai News | Maharashtra Politics

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार (Ajit Pawar) से जुड़ी हालिया विमान घटना (Aircraft Incident) ने देशभर में विमानन सुरक्षा (Aviation Safety), VVIP यात्रा व्यवस्था और विमान रखरखाव प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नागरिक अधिकार संगठनों, विमानन विशेषज्ञों और कानूनी विश्लेषकों ने इस पूरे मामले की हाईकोर्ट की निगरानी में CBI जांच (CBI Probe) की मांग तेज कर दी है।
हालांकि सरकारी स्तर पर इसे एक सामान्य तकनीकी खराबी बताया जा रहा है, लेकिन जानकारों का कहना है कि जब मामला किसी संवैधानिक पदाधिकारी की सुरक्षा से जुड़ा हो, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह प्रकरण न केवल मानव जीवन के अधिकार से जुड़ा है, बल्कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।

• विमान की उड़ान योग्यता (Airworthiness) पर अनसुलझे सवाल

इस विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि क्या उपमुख्यमंत्री अजित पवार की यात्रा के लिए उपयोग किया गया विमान DGCA (नागर विमानन महानिदेशालय) के मानकों के अनुसार उड़ान के लिए पूरी तरह सुरक्षित था।
भारत की Civil Aviation Requirements (CARs) के अनुसार, विशेष रूप से VVIP Flights के लिए:
•कड़ी प्री-फ्लाइट तकनीकी जांच
•नियमित मेंटेनेंस ऑडिट
•तकनीकी खराबियों की लिखित रिपोर्टिंग
अनिवार्य है।
विमानन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि:
•ज्ञात तकनीकी खराबियों को अनदेखा किया गया
•मेंटेनेंस में देरी या लापरवाही बरती गई
•तकनीकी चेतावनी के बावजूद उड़ान की अनुमति दी गई
तो यह घोर लापरवाही और विमानन सुरक्षा कानूनों का उल्लंघन माना जाएगा।
अब तक अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से यह जानकारी साझा नहीं की है:
•विमान का पूरा मेंटेनेंस रिकॉर्ड
•पहले दर्ज किसी तकनीकी खराबी का विवरण
•विमान संचालक और मेंटेनेंस एजेंसी का नाम
•DGCA को औपचारिक सूचना दी गई थी या नहीं

• कानूनी और संवैधानिक पहलू

कानून विशेषज्ञों के अनुसार, यदि तकनीकी खामियों के बावजूद विमान का संचालन किया गया, तो यह मामला निम्न कानूनी प्रावधानों के तहत आ सकता है:
•IPC धारा 304A – लापरवाही से जीवन को खतरा
•Aircraft Act, 1934 और DGCA सुरक्षा नियम
•संविधान का अनुच्छेद 21 – जीवन और सुरक्षा का मौलिक अधिकार
मामले की गंभीरता को देखते हुए यह मांग उठ रही है कि जांच किसी कार्यरत हाईकोर्ट जज की निगरानी में कराई जाए, ताकि किसी भी प्रकार का राजनीतिक दबाव न रहे।

• राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) से हस्तक्षेप की मांग

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने National Human Rights Commission (NHRC) से इस मामले में स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि राज्य तंत्र किसी उपमुख्यमंत्री की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहता है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
यदि VVIP यात्राओं में सुरक्षा मानकों से समझौता संभव है, तो आम यात्रियों के लिए खतरा कहीं अधिक बढ़ जाता है।

• राजनीतिक संदर्भ और साजिश की आशंका

यह मामला अब Maharashtra Politics से भी जुड़ गया है। मौजूदा राजनीतिक हालात में अजित पवार की भूमिका को देखते हुए कुछ विश्लेषकों का कहना है कि जांच के दौरान किसी भी एंगल—तकनीकी लापरवाही, जानबूझकर की गई चूक या संभावित साजिश—को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि अब तक किसी राजनीतिक साजिश का ठोस सबूत सामने नहीं आया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बिना स्वतंत्र जांच के जल्द निष्कर्ष निकालना जनता के भरोसे को कमजोर कर सकता है।

• CBI जांच की बढ़ती मांग

तकनीकी, प्रशासनिक, कानूनी और राजनीतिक सभी पहलुओं को देखते हुए अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि:
•विमान के मेंटेनेंस दस्तावेजों की जांच हो
•DGCA से मिली मंजूरियों की समीक्षा की जाए
•जिम्मेदार अधिकारियों या निजी एजेंसियों की पहचान हो
•लापरवाही, दबाव या बाहरी हस्तक्षेप की संभावना को पूरी तरह खारिज किया जाए
इन सभी बिंदुओं की न्यायिक निगरानी में CBI जांच कराई जाए।

• सरकारी चुप्पी ने बढ़ाया संदेह

अब तक न तो महाराष्ट्र सरकार और न ही नागरिक विमानन मंत्रालय की ओर से किसी स्वतंत्र और विस्तृत जांच की औपचारिक घोषणा हुई है। अधिकारियों की यह चुप्पी जनता के संदेह को और गहरा कर रही है तथा पारदर्शिता की मांग तेज हो रही है।
यह घटना एक बार फिर भारत की Aviation Oversight System में मौजूद खामियों को उजागर करती है और VVIP यात्रा सुरक्षा में जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

• CBI जांच की स्वतंत्र मांग

Sprouts News Media House के संपादक और खोजी पत्रकार उन्मेष गुजराथी (Unmesh Gujarathi) ने इस मामले में CBI जांच की स्पष्ट मांग की है। उन्होंने कहा कि विमानन सुरक्षा से जुड़ी संभावित गंभीर चूक, नियामक विफलताओं और किसी भी प्रकार की राजनीतिक या प्रशासनिक साजिश की आशंका को दूर करने के लिए हाईकोर्ट की निगरानी में निष्पक्ष जांच अनिवार्य है।
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